अंग्रेज़ सेना कांपती थी मैसूर टाइगर टीपू सुल्तान के रॉकेटों के सामने

टीपू सुल्तान वो शख्सियत थे जिनके बारे में आज तक बातें की जाती हैं। वो अक्सर कहते थे कि शेर की तरह जिओ, बेशक एक दिन ही सही। उनको आज भी मैसूर टाइगर के रूप में याद किया जाता है। लेकिन उनके बारे में एक ऐसी बात भी है जो उन्हें खास बना देती है, बहुत खास।

पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय एपीजे अब्दुल कलाम अपनी किताब ‘अग्नि की उड़ान’ के पेज नंबर 36 पर लिखते हैं कि 18वीं सदी में टीपू सुल्तान ने जो सपना देखा था वह 20वीं सदी में जाकर पूरा हुआ।

आखिर वह कौन सा सपना था जिसका जिक्र कलाम साहब ने किया था? वह कौन सी बात है जो टीपू को खास बना देती है? इन सवालों का जवाब है रॉकेट टेक्नोलॉजी। आम तौर पर इस शब्द को बेहद कठिन काम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जो काम टीपू ने किया उसे आसान कहा भी नहीं जा सकता वो भी उस जमाने में जब लोग छींक देने को भी भयंकर अशुभ मानते थे।

टीपू सुल्तान ने युद्ध के मैदान में रॉकेटों का इस्तेमाल किया। संभवत: ये दुनिया में पहली बार हुआ जब युद्ध के मैदान में रॉकेट का इस्तेमाल हुआ हो। टीपू के इस हथियार ने भविष्य को नई संभावनाएं दीं, कल्पना की उड़ान दी और एक बेहद खतरनाक हथियार दिया।

रॉकेट टेक्नोलॉजी – मेड इन इंडिया

पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब ‘अग्नि की उड़ान’ में लिखा है कि,”जब सन 1799 में टीपू सुल्तान युद्ध में मारा गया तब अंग्रेजों की सेना ने 700 से ज्यादा रॉकेट पकड़े थे और 900 रॉकेटों की उप प्रणालियां पकड़ी थीं।”

उन्होंने आगे लिखा है कि,”उसकी सेना में 27 ब्रिगेड थीं जिन्हें ‘कुशनू’ कहा जाता था और हर ब्रिगेड में एक रॉकेट कंपनी थी। इसे ज़र्क्स के नाम से पुकारा जाता था। इन रॉकेटों को बाद में विलियम कांग्रेव इंग्लैंड ले गया और इस तरह ये ब्रिटेन के हो गए।”

वे लिखते हैं,”उस समय कोई गैट, आईपीआर एक्ट या पेटेंट कानून तो था नहीं। इस तरह टीपू सुल्तान की मौत के साथ ही भारतीय रॉकेट भी खत्म हो गए। कम से कम 150 साल के लिए।”

इसरो के रिटायर्ड सीनियर साइंटिस्ट काली शंकर ने एक किताब लिखी है- रॉकेटों का रोचक संसार। इस किताब में उन्होंने लिखा है,”प्रथम लौह आवरण एवं धातु सिलेंडर रॉकेट का निर्माण लोहे की ट्यूबों से किया गया था जिनका विकास मैसूर साम्राज्य के मुस्लिम शासक टीपू सुल्तान और उनके पिता हैदर अली के द्वारा 1780 में किया गया था।”

1985 को भारतीय वैज्ञानिक रोद्दाम नरसिम्हा ने एक लेक्चर दिया जिसमें उन्होंने टीपू के रॉकेटों के बारे में विस्तार से बताया है।

कैसे थे ये रॉकेट?

देखने में तो ये दिवाली के रॉकेट की तरह होते थे लेकिन थोड़े बड़े, थोड़े ज्यादा बड़े। इन रॉकेटों में पहले तो बांस का ही इस्तेमाल किया जाता था लेकिन बाद में टीपू ने इनमें करीब 4 फीट की तलवारें इस्तेमाल करनी शुरु की दी थीं।

ये रॉकेट एक-दो किलोमीटर तक मार कर सकने में सक्षम थे और जब ये गिरते थे तो मानो हजारों तलवारें एक साथ गिरती थीं और विपक्षी सेना बेहाल हो जाती थी।

रॉकेट का इस्तेमाल पहले टीपू के पिता हैदर अली ने किया। वह सिग्नल देने-लेने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे फिर उन्होंने इसे हथियार बनाने के बारे में सोचा और काफी हद तक सफल भी रहे लेकिन होनहार पिता के होनहार बेटे ने अधूरे काम को पूरा करने का जिम्मा उठाया।

टीपू ने राकेट के साइज को बड़ा किया और उसमें लगे सिलेंडर को भी ताकि वह अधिक दूरी तय कर सके। इसके बाद उसने बांस की जगह 4 फीट की तलवारों का इस्तेमाल शुरु किया।

कैसे होता था इस्तेमाल?

शुरुआत में तो इसे कुछ इस तरह ही इस्तेमाल किया जाता था जैसे दिवाली के रॉकेट को किया जाता है। बाद में इसका मुंह शत्रु की ओर मोड़ा गया और हमले किए गए। फिर टीपू ने कुछ तोपनुमा लॉन्चर्स बनवाए जो रॉकेट छोड़ने के काम आते थे। इन लॉन्चर्स के जरिए एक बार में तीन रॉकेट छोड़े जा सकते थे।

ये रॉकेट निशाने पर तो नहीं लगते थे लेकिन यह काफी अधिक संख्या में होते थे और जमीन पर गिरते वक्त ये शत्रु सेना को बुरी तरह घायल कर देते थे। खास तौर पर घुड़सवार सेना तो इस किस्म के हमलों से बहुत घबराती थी। 1772 और 1799 के युद्धों में टीपू ने इन रॉकेटों का इस्तेमाल किया।

दुनिया भर में इज्जत, पर भारत में?

ब्रिटेन का एक ऑक्शन हाऊस है जिसका नाम है बोनहैम्स। इस ऑक्शन हाऊस ने हाल ही में टीपू सुल्तान से जुड़ी कुछ चीजें बेचीं जो करोड़ों रुपये में बिकीं। टीपू की तोप 14 करोड़ रुपये में नीलाम हुई। यह मल्टी बैरल तोप रॉकेट लांचर के रूप में इस्तेमाल होती थी।

पूरी दुनिया टीपू की इस खूबी के बारे में जानती है। इंटरनेट भरा पड़ा है लेकिन क्या हमारे देश के लोग, हमारी युवा पीढ़ी इस बात को जानती है? टीपू के पास मौके थे कि वो अंग्रेजों से हाथ मिला लें, उनके साथ हो जाएं लेकिन टीपू ने कहा कि इज्जत की एक दिन की जिन्दगी ज्यादा बेहतर है।

वो अंत में भी सुरंग के रास्ते निकल कर भाग सकते थे लेकिन उन्होंने अपने लोगों और अपने देश के लिए लड़ते हुए मरना पसंद किया। लेकिन क्या हम रॉकेट तकनीक के इस हीरो को उतनी इज्जत दे पाए जिसका वह हकदार था?

फोटो साभार- bonhams