कुंभलगढ़ किले की दीवार को नहीं भेद पाया था बादशाह अकबर भी

राजस्थान में एक दीवार ऐसी भी है जिसे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार कहा जाता है। ये है कुंभलगढ़ की दीवार। राजसमंद जिले के कुंभलगढ़ किले की यह दीवार 15वीं सदी में महाराणा कुम्भा ने बनवाई थी।

यह दीवार 36 किलोमीटर में फैली हुई है। यह चीन की दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है। इस किले में 360 मंदिर भी हैं। दीवार की चौड़ाई 15 से 25 फीट तक है। बताया जाता है कि इस पर आठ से 10 घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं।

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कभी कोई नहीं भेद पाया इस दीवार को

राजस्थान के उदयपुर जिले से करीब साठ किमी दूर स्थित कुंभलगढ़ किले की दीवार को भेदना किसी के बस की बात नहीं रही। यहां तक कि सम्राट अकबर भी इसको भेदने में असफल रहे।

अकबर के बाद उसके बेटे सलीम ने भी ऐसा प्रयास किया था लेकिन उसके हाथ भी नाकामयाबी ही आई।

ऐसा कहते हैं कि एक बार मुगल आक्रमणकारियों ने किले में घुसने के लिए तीन महिलाओं को जान से मारने की धमकी दी और गुप्त रास्ता पूछा। महिलाएं डर गईं और महल में जाने का गुप्त द्वार बता दिया। लेकिन वह अंदर नहीं आ पाए।

राजा को जब उन महिलाओं के बारे में पता चला तो उन्होंने तीनों को किले के द्वार पर दीवार में ही जिंदा चुनवा दिया था। हालांकि इस बात की सत्यता को परखना काफी मुश्किल काम है।

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15 साल में बन पाया था कुंभलगढ़ किला

यह दुर्ग समुद्रतल से करीब 1100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसका निर्माण सम्राट अशोक के दूसरे पुत्र सम्प्रति के बनाए दुर्ग के अवशेषों पर किया गया था।

कहते हैं कि इस दुर्ग के पूर्ण निर्माण में 15 साल (1443-1458) लगे थे। दुर्ग का निर्माण पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के बनवाये थे जिन पर दुर्ग और इसका नाम अंकित था।

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बेहद अजीब है दीवार की कहानी

कहते हैं कि इस दीवार का निर्माण कार्य पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ऐसे में एक संत को सपने में देवी ने दर्शन दिया और उन्होंने संत को दीवार का निर्माण कार्य पूरा होने का राज बताया।

संत ने बताया कि उसे पहाड़ी पर चलने दिया जाए और जहां वो रुके वहीं उनकी बलि चढ़ा दी जाए। वहां एक देवी का मंदिर बनाया जाए। ठीक ऐसा ही हुआ और वह कुछ किलोमीटर तक चलने के बाद रुक गया।

रुकते ही उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। जहां पर उसका सिर गिरा वहां किले का मुख्य द्वार है और जहां पर उसका शरीर गिरा वहां दूसरा मुख्य द्वार है।

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बेटे ने ही ले ली कुम्भा की जान

महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुंभलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा।

यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। जिन महाराणा कुम्भा को कोई नहीं हरा सका, उन्हें उन्हीं के पुत्र उदयकर्ण ने उनकी जान ले ली। महाराणा के बड़े बेटे उदयसिंह को ऊदा के नाम से भी जाना जाता है।

ऊदा ने यहीं पर स्थित एक कुंड के पास पिता कुम्भा की हत्या कर दी थी।