पढ़िए उस भारतीय की कहानी जिसे चीन के लोग देवता की तरह पूजते हैं

Dwarkanath Kotnis
Dwarkanath Kotnis

बीजिंग. आमतौर पर भारत और चीन के बॉर्डर पर शांति का माहौल होता है। फिर भी मीडिया में दोनों देशों के बीच कुछ ऐसी बातों का जिक्र हो ही जाता है जो अविश्वास को बढ़ावा देती हैं। चीन को लेकर भारत का आम नागरिक 1962 की कड़वी यादें नहीं भूल सकता। तब उसने विश्वासघात कर भारत पर हमला किया। यही नहीं, उसने हमारा काफी बड़े भू भाग पर कब्जा कर रखा है। वहीं इन सबसे अलग एक भारतीय शख्स ऐसा भी है जिसका चीन में बहुत सम्मान किया जाता है। चीन के लिए उन्हें किसी देवता से कम नहीं समझते।

1. इनका नाम है डॉ. द्वारकानाथ को​टनिस। भले ही भारत में उन्हें ज्यादातर लोग न जानें लेकिन चीन में उन्हें जानने वालों की काफी तादाद है। डॉ. कोटनिस का जन्म 10 अक्टूबर 1910 को महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ था। बचपन से ही वे बहुत मेधावी थे। परीक्षाएं पास करते हुए उन्होंने मुंबई के जीएस मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया और चिकित्सा की डिग्री ली।

2. उन्हीं दिनों दुनिया में दूसरे विश्वयुद्ध का माहौल था। करोड़ों लोग मारे गए। संपत्ति का अथाह नुकसान हुआ। उस समय डॉ. कोटनिस चीन गए हुए थे। दरअसल वे एक सद्भावना मिशन के तहत चीन गए थे। वहां उन्होंने युद्ध में घायल, बीमार और परेशान लोगों को देखा तो सबकुछ छोड़कर उनकी सेवा में लग गए।

3. चूंकि विश्वयुद्ध चल रहा था तो हजारों की संख्या में घायल आ रहे थे। ऐसे में डॉ. कोटनिस अपने स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए घायलों की सेवा कर रहे थे। कई बार तो वे बिना भोजन—आराम किए पूरी—पूरी रात लोगों की देखभाल करते रहते। इस वजह से चीन के लोग उनका बहुत आदर करते थे, परंतु अपनी सेहत का ध्यान न रखने की वजह से डॉ. कोटनिस ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रह सके।

4. मात्र 32 साल की उम्र में (9 दिसंबर 1942) उनका देहांत हो गया। चीन के लोगों को उनकी मौत का बहुत दुख हुआ। चीनी लोगों ने डॉ. कोटनिस के सम्मान में वहां के शिलियाजुआंग में उनकी प्रतिमा स्थापित की जो आज भी वहां कायम है। चीन के लोग इस प्रतिमा को देखकर आदर से अपना सिर झुका लेते हैं। चीन के सरकारी रेडियो पर अक्सर डॉ. कोटनिस के महान कार्यों की खूब प्रशंसा की जाती है।

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