पत्रकारिता की बात हो तो चिंता तो इन सब बातों की भी होनी चाहिए

किसी भी हत्या को जस्टीफाई नहीं किया जा सकता। हत्यारे शरीर को खत्म करते हैं विचारों को नहीं। किसी की हत्या केवल इसलिए नहीं की जा सकती कि वह अपसे अलग विचार रखता है। हत्या अपराध है और अपराध आपके विचार को दिखाता है। मृत्यु भारतीय समाज में दुख का विषय होती है, खुशी का नहीं और अगर कोई मृत्यु जैसी चीज पर खुश है तो समाज के लिए चिंता का विषय है।

चिंता और चिंतन करने के लिए भारतीय पत्रकार समाज तैयार है लेकिन पत्रकारों के मंच पर नेताओं का होना भी चिंता का विषय है। एक और बात कि ये चिंता और एकजुटता तब कहां होती है जब मुजफ्फरनगर में एक स्ट्रिंगर की हत्या होती है और उसका चैनल उसे अपना पत्रकार मानने से भी हिचकिचाता है। मेरठ के एक पत्रकार की गाड़ी जला दी जाती है और उसका चैनल उससे मुंह बंद रखने के लिए कहता है।

एक रिपोर्टर एक घोटाले की जांच के लिए जाता है और वापस लौटती है उसकी लाश। कोलकाता के पास एक रेल हादसा होता है, पत्रकार मोटरसाइकिल लेकर हादसे की जगह के लिए दौड़ता है लेकिन रास्ते में एक्सीडेंट हो जाता है। पत्रकार का पैर टूट जाता है, वो घायल हो जाता है लेकिन संपादक उसे नौकरी से निकाल देता है क्योंकि विजुअल कहीं और से काटने पड़े। उस घायल पत्रकार के पक्ष में कोई सभा नहीं होती। ये चिंता तब कहां होती है एक अखबार के ऑफिस में घुस कर एक महिला, पत्रकार पर गंभीर आरोप लगाती है, क्योंकि पत्रकार लगातार एक माफिया के खिलाफ छाप रहा था।

जान से मारने की धमकियां मिलना पेशे में आम बात है। ये हमारे काम का हिस्सा है सोच कर हम इसे हल्के में ले लेते हैं लेकिन क्या ये चिंता का विषय नहीं है। असाइनमेंट तेज और तुरंत का दवाब बनाता है, स्ट्रिंगर बाइक तेज भगाता है, कई बार हादसे भी होते हैं। 24 घंटे का काम और हाथ में चंद पैसे। लेकिन इस पर चिंता की शायद कोई जरूरत नहीं।

ये चिंताएं कहां होती हैं जब क्लासीफाइड वाले पन्ने पर यौन शक्तिवर्धक दवाओं के विज्ञापन छापे जाते हैं, होली-दिवाली पर रिपोर्टरों के हाथ में विज्ञापन की पर्चियां थमा दी जाती हैं और टारगेट पूरा करने का दवाब डाला जाता है। ये चिंताएं तब क्यों नहीं होतीं जब स्ट्रिंगर का पैसा साल साल भर दिया नहीं जाता, उन पर नेताओं से विज्ञापन लेने का दवाब बनाया जाता है। चुनावी गाड़ी के लिए टारगेट फिक्स किए जाते हैं। एक साथ बहुत से पत्रकारों को नौकरियों से निकाल दिया जाता है लेकिन किसी को कोई चिंता नहीं होती।

पत्रकार सरकार के खिलाफ तो आवाज उठा सकता है लेकिन अपने ही संस्थान में हो रहे गलत के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता। क्या ये चिंता और चिंतन का विषय नहीं है। एक पत्रकार की हत्या पर चिंता होनी चाहिए, लेकिन चिंता वो करे जो खुद पत्रकारों का शोषक ना हो। और ऐसे संपादक/पत्रकार बेहद कम हैं जो वाकई मंच पर बैठ कर ये चिंता कर सकते हैं। न्यूज़ बिजनेस के लिए कत्ल कर दी गई पत्रकारिता पर चिंता कर सकते हैं। ऐसे असली पत्रकारों और संपादकों को सलाम और वो लोग जो खुद शोषक हैं वो पत्रकारिता की बात ना करें तो बेहतर।